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सीतामढ़ी अस्पताल में इंसानियत शर्मसार: शव ले जाने को नहीं मिला स्ट्रेचर, ठेले पर ले गए परिजन

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बिहार के सीतामढ़ी में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं, जहां एक मृतक के परिजनों को स्ट्रेचर और शव वाहन न मिलने पर ठेले पर शव ले जाना पड़ा।

सीतामढ़ी/आलम की खबर:बिहार के सीतामढ़ी जिले से सामने आई एक दिल दहला देने वाली घटना ने एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर सरकार बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर हालात इतने बदतर हैं कि एक मृत व्यक्ति के परिजनों को उसका शव अस्पताल से ठेले पर ले जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह घटना न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के पूरी तरह खत्म हो जाने का भी संकेत देती है।

जानकारी के अनुसार, यह मामला सीतामढ़ी जिले के डुमरा प्रखंड के चक्का रसलपुर गांव का है। गांव निवासी अमर कुमार को अचानक बिजली का करंट लग गया, जिससे उनकी हालत बेहद गंभीर हो गई। परिवार के लोग घबराए हुए उन्हें तत्काल इलाज के लिए सीतामढ़ी सदर अस्पताल लेकर पहुंचे। परिजनों को उम्मीद थी कि अस्पताल में समय पर इलाज मिल जाएगा और उनकी जान बचाई जा सकेगी, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। डॉक्टरों ने जांच के बाद अमर कुमार को मृत घोषित कर दिया।

मौत की इस खबर ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया। लेकिन असली मुश्किल इसके बाद शुरू हुई। जब परिजनों ने शव को घर ले जाने के लिए अस्पताल प्रशासन से मदद मांगी, तो उन्हें कोई सहयोग नहीं मिला। न तो स्ट्रेचर उपलब्ध कराया गया और न ही शव वाहन की व्यवस्था की गई। परिजन लगातार अस्पताल कर्मियों से गुहार लगाते रहे, लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी।

आखिरकार, मजबूरी में परिजनों ने एक ठेला का इंतजाम किया और उसी पर शव को रखकर अस्पताल से बाहर निकलना पड़ा। अस्पताल परिसर में यह दृश्य जिसने भी देखा, वह स्तब्ध रह गया। एक तरफ परिवार अपने प्रियजन की मौत के गम में डूबा था, तो दूसरी ओर उन्हें इस अमानवीय परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा था। यह तस्वीर न केवल दर्दनाक थी, बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोलने वाली भी थी।

मृतक के परिजनों ने आरोप लगाया कि अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। उनका कहना है कि अगर अस्पताल में स्ट्रेचर या शव वाहन की व्यवस्था होती, तो उन्हें इस तरह की बेइज्जती और तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ता। परिजनों ने प्रशासन से इस मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या सरकारी अस्पतालों में न्यूनतम सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं? क्या स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित रह गई है? जब एक मृत व्यक्ति के साथ भी इस तरह का व्यवहार किया जाता है, तो जिंदा मरीजों की हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए सिर्फ बजट बढ़ाना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके सही क्रियान्वयन पर भी ध्यान देना जरूरी है। अक्सर देखा जाता है कि योजनाएं बनती हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन उनका असर जमीनी स्तर पर नजर नहीं आता। यही वजह है कि ऐसी घटनाएं बार-बार सामने आती हैं और हर बार सिस्टम पर सवाल उठते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई बार अस्पतालों की बदहाली सामने आ चुकी है, लेकिन हर बार जांच और आश्वासन के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। अगर इस बार भी ऐसा ही हुआ, तो आने वाले समय में हालात और भी खराब हो सकते हैं।

यह घटना केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में एक संवेदनशील और जिम्मेदार समाज में रह रहे हैं? क्या गरीब और आम आदमी की जिंदगी और मौत की कोई कीमत नहीं रह गई है?

जरूरत इस बात की है कि प्रशासन इस मामले को गंभीरता से ले और जल्द से जल्द कार्रवाई करे। अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को इस तरह की पीड़ा का सामना न करना पड़े।

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